पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन
मानव गतिविधियाँ पृथ्वी के वायुमंडल में विद्यमान ग्रीन हाउस गैसों, एयरोसोल्स (छोटे कणों) और बादलों की मात्रा में परिवर्तन करके जलवायु बदलाव में योगदान करती हैं। 2015 में वायुमंडलीय सीओ2 का सांद्रीकरण पूर्व-औद्योगिक मान 280 पीपीएम से बढ़कर 400 पीपीएम हो गया है। 2005 का सीएच4 बाहुल्य 1774 पीपीबी अपने पूर्व-औद्योगिक मान के दोगुने से भी अधिक है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन पैनल की चौथी मूल्यांकन रिपोर्ट सतह वायु तापन में 1.8 डिग्री सेल्सियस 4.0 डिग्री सेल्सियस तक (विभिन्न परिदृश्यों के अंतर्गत), समुद्र सतह में 0.18-0.59 मीटर की बढ़त और ताप लहरों तथा भारी वर्षा की घटनाओं में उच्च आवृत्ति का पूर्वानुमान लगाती है।

जलवायु परिवर्तन सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों में एक है जिसका प्रभाव खाद्य उत्पादन, जल आपूर्ति, स्वास्थ्य, ऊर्जा, आदि पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन और इसके प्रशमन उपाय सुझाना आवश्यक है। अन्य अवलोकनों और अध्ययनों के साथ मिलकर, पृथ्वी तंत्र में प्राकृतिक और मानव प्रेरित परिवर्तन के संबंध में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नीति के विकास के लिए एक ठोस वैज्ञानिक आधार प्रदान करना, अंतरिक्ष आधारित वैश्विक परिवर्तन अवलोकन का लक्ष्य है।

अंतरिक्ष आधारित सुदूर संवेदन पृथ्वी के संसाधनों के मानचित्रण, उनके परिवर्तन की निगरानी और जैव भूभौतिकीय मानकों को प्राप्त करने में मदद करता है। यह जानकारी जलवायु परिवर्तन के सूचकों और कारकों की पहचान करने में मदद करती है। अंतरिक्ष आधारित आदानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का पूर्वानुमान लगाने के लिए भौतिक सिमुलेशन मॉडल के साथ एकीकृत किया जा सकता है। यह तीन पहलुओं से संबंधित जानकारी प्रदान करता है (i) जलवायु परिवर्तन के संकेतक (ii) जलवायु परिवर्तन के कारक, उनके स्रोत तथा वितरण स्वरूप और (iii) विभिन्न क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अनुकूलन उपायों तथा तैयारियों की दिशा में योजना बनाने में मददगार प्राकृतिक संसाधनों की मॉडलिंग।


अल्पाइन पारिस्थितिकी तंत्र गतिकीय

प्रवाल विरंजन

मैंग्रोव अभिलक्षण वर्णन

ट्रेस गैस परिवर्तनशीलता

स्थलीय पर्यावरण में जलवायु परिवर्तन अनुसंधान कार्यक्रम (प्रकृति) चरण कार्यक्रम वर्तमान में भारतीय प्रवाल भित्तियों जैसे जीवंत/क्रांतिक निवास से लेकर विविध निवास के जलवायु परिवर्तन/जलवायु आधारित मॉडलिंग एवं अभिलक्षणन अध्ययन और उच्च ऊंचाई हिमालय अल्पाइन पारिस्थितिकी तंत्र में मैंग्रोव दलदल, भारतीय पारिस्थितिकी जलविज्ञान तथा ध्रुवीय पर्यावरण प्रक्रियाओं के साथ भारतीय मानसून दूरसंबंध पर जांच शामिल हैं। अध्ययनों से भू मापन, अंतरिक्ष आदान और जलवायु प्रक्षेप डेटा के सहक्रियाशील उपयोग के साथ किया जाता है। विभिन्न परियोजनाओं का विस्तृत उद्देश्य हैः

  • भारत की पारिस्थितिकी-जलविज्ञान और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की मॉडलिंग
    Tयह अध्ययन राष्ट्रीय जल संतुलन के लिए सेल आधारित एकीकृत हाइड्रोलॉजिकल प्रणाली मॉडल के विकास पर जोर देता है। जल संतुलन विश्लेषण और भारत की प्रमुख और मध्यम नदियों की घाटियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, भारतीय हिमालय, पहाड़ी क्षेत्रों आदि से बर्फ पिघलने के प्रभाव, आदि।
  • अल्पाइन पारिस्थितिकी तंत्र गतिशीलता और भारतीय हिमालय में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
    यह अध्ययन के प्रयोग और भारतीय हिमालय की अल्पाइन पारिस्थितिकी प्रणालियों में लंबी अवधि के पारिस्थितिक रिकॉर्ड की स्थापना और प्रयोग की मॉडलिंग के बारे में है। अन्य उद्देश्यों में सहज भू-स्थानिक डेटाबेस का विकास, अल्पाइन परिदृश्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, अल्पाइन पारिस्थितिकी तंत्र की प्रतिक्रिया आदि को समझना भी शामिल है।
  • भारतीय मैंग्रोव के लिए जैव-भौतिकी विशेषता और स्थल उपयुक्तता विश्लेषण
    इस अध्ययन का प्रमुख लक्ष्य सुदूर संवेदन डेटा का उपयोग कर भारत के मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र चिह्नित करना है। जैव-भौतिकी मापदंडों की मॉडलिंग, सकल प्राथमिक उत्पादकता का आकलन, मैंग्रोव वनीकरण/वृक्षारोपण के लिए अनुकूल क्षेत्रों की पहचान आदि का भी अध्ययन किया जाएगा।
  • समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों पर वैश्विक परिवर्तन के प्रभाव के साथ प्रवाल भित्तियों पर विशेष ध्यान
    यह अध्ययन भारत के पांच प्रमुख शैलभित्ति क्षेत्रों के लिए क्षेत्र विशिष्ट कोरल विरंजन प्रणाली विकसित करने पर प्रकाश डालता है। अध्ययन शैलभित्ति क्षेत्रों के सूक्ष्म वास अनुक्षेत्र वर्गीकरण, शैलभित्ति नींव संकेत लक्षण का प्रस्ताव, मूंगा चट्टान पारिस्थितिकी तंत्र पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव आदि का लक्ष्य रखता है।
  • ध्रुवीय पर्यावरण प्रक्रियाओं के साथ भारतीय मानसून के टेली-कनेक्शन की जाँच
    इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य उपग्रह से प्राप्त डेटा और सूचकांक का उपयोग करते हुए ध्रुवीय पर्यावरण और भारतीय मानसून के बीच टेली-कनेक्शन को समझने के लिए मॉडल विकसित करना है।


कृषि सूखा अभिलक्षणन के लिए वाष्पोत्सर्जन

कृषि क्षेत्र में सतह उत्सर्जित मीथेन और गर्म अपशिष्टों का युग्मन

प्रगति और भावी योजनाएँ
इन अध्ययनों ने भारतीय अल्पाइन क्षेत्र में लंबी अवधि के परिवर्तन और जीआईएस अनुरूप प्रारूप में अल्पाइन वृक्षरेखा के डेटाबेस के लिए साइटों की स्थापना की है, एसएसटी आधारित क्षेत्र विशिष्ट शैवाल विरंजन चेतावनी प्रणाली विकसित की है, चुनिंदा सदाबहार वनों के प्रकाश-संश्लेषण का आकलन किया है और राष्ट्रीय स्तर जल-संतुलन की मॉडलिंग हेतु उपग्रह आधारित हाइड्रोलॉजिकल मॉडल बनाया गया है जिसमें हिमालयी क्षेत्र और भारत के विभिन्न प्रणालियों के जल-संतुलन विश्लेषण और ध्रुवीय वातावरण में परिवर्तन तथा भारतीय मानसून में परिवर्तन के बीच टेली-कनेक्शन की समझ भी शामिल है।